25 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today Murli Poem)

Hindi Poem from today’s murli. Aaj ki gyan murli se ek Kavita 25 Feb 2019. This poem is daily written on day’s murli by Brahma Kumar (BK) Mukesh (from Rajasthan). To read more Hindi poems written, visit Murli Poems page.

Murli poem

* मुरली कविता दिनांक 25.2.2019 *

आत्म अभिमानी बनने से दैवी गुण आते जाएंगे

अपार खुशी रहेगी क्रिमिनल ख्याल मिट जाएंगे

स्मृति रखो हम दैवी स्वराज्य स्थापन करने वाले

मृत्युलोक छोड़कर हम अमरलोक में जाने वाले

ये स्मृति रखने से तुम्हारी चलन सुधरती जाएगी

दैवी गुण जागृत होंगे और खुशी बढ़ती जाएगी

हम बच्चे थे रामराज्य और सूर्यवंशी घराने वाले

बहुत जल्द फिर से हम उसी राज्य में जाने वाले

रावण ने ही छीना था सूर्यवंशी राम राज्य हमारा

बाप ने आकर समझाया भूलो रावण राज्य सारा

सदाकाल के सुख की दुनिया में हमको है जाना

यही निश्चय जगाकर बच्चों सच्ची खुशी मनाना

रावण ने यहां आकर हमारी चाल चलन बिगाड़ी

सुख से भरी दुनिया हमारी उसने आकर उजाड़ी

बेहद के बाप खुद ही आकर दैवीगुण सिखलाते

इसी खुशी का बच्चों तुम पारा क्यों नहीं चढ़ाते

सतयुग के दैवी गुण बच्चों फिर से धारण करना

सर्वगुण सम्पन्न बनने की तुम पूरी मेहनत करना

सुखदाता बाप के बच्चों तुम औरों को सुख देना

अवगुणी आदतों के वश दुख ना किसी को देना

बहुतों का कल्याण करना वाणी मीठी बनाकर

जगतजीत देवता बनना विकारों पर जीत पाकर

हम बच्चों की भाग्य रेखा स्वयं भगवान खींचते

श्रेष्ठ भाग्य से अपने बच्चों की जन्मपत्री सींचते

ब्राह्मणों के जीवन में सबकुछ अच्छा होने वाला

स्वयं भाग्य विधाता हमें इसकी गारंटी देने वाला

एक बाप से सर्व संबंधों का रस तुम लेते जाओ

एकरस स्थिति का अनुभव हर पल करते जाओ

*ॐ शांति*

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25 Feb 2019 आज की मुरली BK murli in Hindi

Brahma Kumaris murli today Hindi Aaj ki gyan murli Madhuban 25-02-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे – आत्म-अभिमानी बनने का अभ्यास करो तो दैवीगुण आते जायेंगे, क्रिमिनल ख्यालात समाप्त हो जायेंगे, अपार खुशी रहेगी”

प्रश्नः-

अपनी चलन को सुधारने वा अपार खुशी में रहने के लिए कौन-सी बात सदा स्मृति में रखनी है?

उत्तर:-

सदा स्मृति रहे कि हम दैवी स्वराज्य स्थापन कर रहे हैं, हम मृत्युलोक को छोड़ अमरलोक में जा रहे हैं – इससे बहुत खुशी रहेगी, चलन भी सुधरती जायेगी क्योंकि अमरलोक नई दुनिया में जाने के लिए दैवीगुण जरूर चाहिए। स्वराज्य के लिए बहुतों का कल्याण भी करना पड़े, सबको रास्ता बताना पड़े।

Murli of BK

ओम् शान्ति।

बच्चों को अपने को यहाँ का नहीं समझना चाहिए। तुमको मालूम हुआ है हमारा जो राज्य था जिसको रामराज्य वा सूर्यवंशी राज्य कहते हैं उसमें कितनी सुख-शान्ति थी। अब हम फिर से देवता बन रहे हैं। आगे भी बने थे। हम ही सर्वगुण सम्पन्न…. दैवीगुण वाले थे। हम अपने राज्य में थे। अभी रावण राज्य में हैं। हम अपने राज्य में बहुत सुखी थे। तो अन्दर में बहुत खुशी और निश्चय होना चाहिए क्योंकि तुम फिर से अपनी राजधानी में जा रहे हो। रावण ने तुम्हारा राज्य छीन लिया है। तुम जानते हो हमारा अपना सूर्यवंशी राज्य था। हम रामराज्य के थे, हम ही दैवीगुण वाले थे, हम ही बहुत सुखी थे फिर रावण ने हमारा राज्य-भाग्य छीन लिया। अब बाप आकर अपना और पराये का राज़ समझाते हैं। आधाकल्प हम रामराज्य में थे फिर आधाकल्प हम रावण राज्य में रहे। बच्चों को हर बात का निश्चय हो तो खुशी में रहें और चलन भी सुधरे। अब पराये राज्य में हम बहुत दु:खी हैं। हिन्दू भारतवासी समझते हैं हम पराये (फॉरेन) राज्य में दु:खी थे, अब सुखी हैं अपने राज्य में। परन्तु यह है अल्पकाल काग विष्टा समान सुख। तुम बच्चे अभी सदा काल के सुख की दुनिया में जा रहे हो। तो तुम बच्चों को अन्दर बहुत खुशी रहनी चाहिए। ज्ञान में नहीं हैं तो जैसे ठिक्कर पत्थरबुद्धि हैं। तुम बच्चे जानते हो हम अवश्य अपना राज्य लेंगे, इसमें तकलीफ की कोई बात नहीं। राज्य लिया था फिर आधा कल्प राज्य किया फिर रावण ने हमारी कला काया ही चट कर दी। कोई अच्छे बच्चे की जब चलन बिगड़ जाती है तो कहा जाता है तुम्हारी कला काया चट हो गई है क्या? यह हैं बेहद की बातें। समझना चाहिए माया ने हमारी कला काया चट कर दी। हम गिरते ही आये। अब बेहद का बाप दैवीगुण सिखलाते हैं। तो खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। टीचर नॉलेज देते हैं तो स्टूडेन्ट को खुशी होती है। यह है बेहद की नॉलेज। अपने को देखना है-मेरे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं? सम्पूर्ण नहीं बनेंगे तो सजायें खानी पड़ेंगी। परन्तु हम सजायें खायें ही क्यों? इसलिए बाप, जिससे यह राज्य मिलता है उसको याद करना है। दैवीगुण जो हमारे में थे वह अब धारण करने हैं। वहाँ यथा राजा-रानी तथा प्रजा सबमें दैवीगुण थे।

दैवीगुणों को तो समझते हो ना। अगर कोई समझते नहीं तो लायेंगे कैसे? गाते भी हैं सर्वगुण सम्पन्न…. तो पुरुषार्थ कर ऐसा बनना है। बनने में मेहनत लगती है। क्रिमिनल आई हो जाती है। बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझो तो क्रिमिनल ख्यालात उड़ जायेंगे। युक्तियां तो बाप बहुत समझाते हैं, जिसमें दैवीगुण हैं उनको देवता कहा जाता है, जिनमें नहीं हैं उनको मनुष्य कहा जाता है। हैं तो दोनों ही मनुष्य। परन्तु देवताओं को पूजते क्यों हैं? क्योंकि उनमें दैवीगुण हैं और उनके (मनुष्यों के) कर्तव्य बन्दर जैसे हैं। कितना आपस में लड़ाई-झगड़ा आदि करते हैं। सतयुग में ऐसी बातें होती नहीं। यहाँ तो होती है। जरूर अपनी भूल होती है तो सहन करना पड़ता है। आत्म-अभिमानी नहीं हैं तो सहन करना पड़ता है। तुम जितना आत्म-अभिमानी बनते जायेंगे उतने दैवीगुण भी धारण होंगे। अपनी जांच करनी है कि हमारे में दैवी गुण हैं? बाप सुखदाता है तो बच्चों का काम है सबको सुख देना।

अपने दिल से पूछना है कि हम किसको दु:ख तो नहीं देते हैं? परन्तु कोई-कोई की आदत होती है जो दु:ख देने बिगर रह नहीं सकते। बिल्कुल सुधरते नहीं जैसे जेल बर्डस। वह जेल में ही अपने को सुखी समझते हैं। बाप कहते हैं वहाँ तो जेल आदि होता ही नहीं, पाप होता ही नहीं जो जेल में जाना पड़े। यहाँ जेल में सजायें भोगनी पड़ती हैं। अभी तुम समझते हो हम जब अपने राज्य में थे तो बहुत साहूकार थे, जो ब्राह्मण कुल वाले होंगे वह ऐसे ही समझेंगे कि हम अपना राज्य स्थापन कर रहे हैं। वह एक ही हमारा राज्य था, जिसको देवताओं का राज्य कहा जाता है। आत्मा को जब ज्ञान मिलता है तो खुशी होती है। जीव आत्मा जरूर कहना पड़े। हम जीव आत्मा जब देवी-देवता धर्म की थी तो सारे विश्व पर हमारा राज्य था। यह नॉलेज है तुम्हारे लिए। भारतवासी थोड़ेही समझते हैं कि हमारा राज्य था, हम भी सतोप्रधान थे। तुम ही यह सारी नॉलेज समझते हो। तो हम ही देवता थे और हमको ही अब बनना है। भल विघ्न भी पड़ते हैं परन्तु तुम्हारी दिन-प्रतिदिन उन्नति होती जायेगी। तुम्हारा नाम बाला होता जायेगा। सब समझेंगे यह अच्छी संस्था है, अच्छा काम कर रहे हैं। रास्ता भी बहुत सहज बताते हैं। कहते हैं तुम ही सतोप्रधान थे, देवता थे, अपनी राजधानी में थे। अब तमोप्रधान बने हो और तो कोई अपने को रावण राज्य में समझते नहीं हैं।तुम जानते हो हम कितने स्वच्छ थे, अब तुच्छ बने हैं।

पुनर्जन्म लेते-लेते पारसबुद्धि से पत्थरबुद्धि बन पड़े हैं। अब हम अपना राज्य स्थापन कर रहे हैं तो तुमको उछलना चाहिए, पुरुषार्थ में लग जाना चाहिए। जो कल्प पहले लगे होंगे वे अब भी लगेंगे जरूर। नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार हम अपना दैवी राज्य स्थापन कर रहे हैं। यह भी तुम घड़ी-घड़ी भूल जाते हो। नहीं तो अन्दर बहुत खुशी रहनी चाहिए। एक-दो को यही याद दिलाओ कि मनमनाभव। बाप को याद करो जिससे ही अब राजाई लेते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। कल्प-कल्प हमको बाप श्रीमत देते हैं, जिससे हम दैवीगुण धारण करते हैं। नहीं तो सजायें खाकर फिर कम पद लेंगे। यह बड़ी भारी लॉटरी है। अब पुरुषार्थ कर ऊंच पद पाया तो कल्प-कल्पान्तर पाते ही रहेंगे। बाप कितना सहज समझाते हैं। प्रदर्शनी में भी यही समझाते रहो कि तुम भारतवासी ही देवताओं की राजधानी के थे फिर पुनर्जन्म लेते-लेते सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते ऐसे बने हो। कितना सहज समझाते हैं। सुप्रीम बाप, सुप्रीम टीचर, सुप्रीम गुरू है ना। तुम कितने ढेर स्टूडेन्ट हो, दौड़ी लगाते रहते हो। बाबा भी लिस्ट मंगाते रहते हैं कितने निर्विकारी पवित्र बने हैं?बच्चों को समझाया गया है कि भृकुटी के बीच में आत्मा चमकती है। बाप कहते हैं मैं भी यहाँ आकर बैठता हूँ। अपना पार्ट बजाता हूँ। मेरा पार्ट ही है पतितों को पावन बनाना। ज्ञान सागर हूँ। बच्चे पैदा होते हैं, कोई तो बहुत अच्छे होते हैं, कोई खराब भी निकल पड़ते हैं। फिर आश्चर्यवत् सुनन्ती, कथन्ती, भागन्ती हो जाते हैं। अरे माया, तुम कितनी प्रबल हो। फिर भी बाप कहते हैं भागन्ती होकर भी कहाँ जायेंगे? यही एक बाप तारने वाला है। एक बाप है सद्गति दाता, बाकी इस ज्ञान को कोई तो बिल्कुल जानते ही नहीं। जिसने कल्प पहले माना है, वही मानेंगे। इसमें अपनी चलन को बहुत सुधारना पड़ता है, सर्विस करनी पड़ती है। बहुतों का कल्याण करना है। बहुतों को जाकर रास्ता बताना है। बहुत-बहुत मीठी जबान से समझाना है कि तुम भारतवासी ही विश्व के मालिक थे। अब फिर तुम इस प्रकार से अपना राज्य ले सकते हो। यह तो तुम समझते हो बाप जो समझाते हैं, ऐसा कोई समझा न सके फिर भी चलते-चलते माया से हार खा लेते हैं। बाप खुद कहते हैं विकारों पर जीत पाने से ही तुम जगतजीत बनेंगे। यह देवतायें जगतजीत बने हैं। जरूर उन्हों ने ऐसा कर्म किया है।

बाप ने कर्मों की गति भी बताई है। रावण राज्य में कर्म विकर्म ही होते हैं, राम राज्य में कर्म अकर्म होते हैं। मूल बात है काम पर जीत पाकर जगतजीत बनने की। बाप को याद करो, अब वापिस घर जाना है। हमको 100 परसेन्ट सरटेन है कि हम अपना राज्य लेकर ही छोड़ेंगे। परन्तु राज्य यहाँ नहीं करेंगे। यहाँ राज्य लेते हैं। राज्य करेंगे अमरलोक में। अब मृत्युलोक और अमरलोक के बीच में हैं, यह भी भूल जाते हैं इसलिए बाप घड़ी-घड़ी याद दिलाते हैं। अब यह पक्का निश्चय है कि हम अपनी राजधानी में जायेंगे। यह पुरानी राजधानी खत्म जरूर होनी है। अब नई दुनिया में जाने के लिए दैवीगुण जरूर धारण करने हैं। अपने से बातें करनी है। अपने को आत्मा समझना है क्योंकि अभी ही हमको वापस जाना है। तो अपने को आत्मा भी अभी ही समझना है फिर कभी वापिस थोड़ेही जाना है जो यह ज्ञान मिलेगा। वहाँ 5 विकार ही नहीं होंगे जो हम योग लगायें। योग तो इस समय लगाना होता है पावन बनने के लिए। वहाँ तो सब सुधरे हुए हैं। फिर धीरे-धीरे कला कम होती जाती है। यह तो बहुत सहज है, क्रोध भी किसको दु:ख देता है ना। मुख्य है देह-अभिमान। वहाँ तो देह-अभिमान होता ही नहीं। आत्म-अभिमानी होने से क्रिमिनल आई नहीं रहती। सिविल आई बन जाती है। रावण राज्य में क्रिमिनल आई बन जाती है।

तुम जानते हो हम अपने राज्य में बहुत सुखी रहते हैं। कोई काम नहीं, कोई क्रोध नहीं, इस पर शुरू का गीत भी बना हुआ है। वहाँ यह विकार होते नहीं। हमारी अनेक बार यह हार और जीत हुई है। सतयुग से कलियुग तक जो कुछ हुआ वह फिर रिपीट होना है। बाप अथवा टीचर के पास जो नॉलेज है वह तुमको सुनाते रहते हैं। यह रूहानी टीचर भी वन्डरफुल है। ऊंचे से ऊंचा भगवान्, ऊंचे से ऊंचा टीचर भी है और हमको भी ऊंचे से ऊंचा देवता बनाते हैं। तुम खुद देख रहे हो – बाप कैसे डिटीज्म स्थापन कर रहे हैं। तुम खुद ही देवता बन रहे हो। अभी तो सभी अपने को हिन्दू कहते रहते हैं। उन्हों को भी समझाया जाता है कि वास्तव में आदि सनातन देवी-देवता धर्म है और सबका धर्म चलता रहता है। यह एक ही देवी-देवता धर्म है, जो प्राय:लोप हो गया है। यह तो बहुत पवित्र धर्म है। इन जैसा पवित्र धर्म कोई होता नहीं। अब पवित्र न होने कारण कोई भी अपने को देवता नहीं कहला सकते हैं। तुम समझा सकते हो कि हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के थे तब तो देवताओं को पूजते हैं। क्राइस्ट को पूजने वाले क्रिश्चियन ठहरे, बुद्ध को पूजने वाले बौद्धी ठहरे, देवताओं को पूजने वाले देवता ठहरे। फिर अपने को हिन्दू क्यों कहलाते हो? युक्ति से समझाना है। सिर्फ कहेंगे हिन्दू धर्म, धर्म नहीं है, तो बिगड़ेंगे। बोलो, हिन्दू आदि सनातन धर्म के थे तो कुछ समझें कि आदि सनातन धर्म तो कोई हिन्दू नहीं है। आदि सनातन अक्षर ठीक है। देवता पवित्र थे, यह अपवित्र हैं इसलिए अपने को देवता नहीं कहला सकते हैं। कल्प-कल्प ऐसे होता है, इनके राज्य में कितने साहूकार थे। अब तो कंगाल बन पड़े हैं। वह पद्मापद्मपति थे। बाप युक्तियां बहुत अच्छी देते हैं। पूछा जाता है तुम सतयुग में रहने वाले हो या कलियुग में? कलियुग के हो तो जरूर नर्कवासी हो। सतयुग में रहने वाले तो स्वर्गवासी देवता होंगे। ऐसा प्रश्न पूछेंगे तो समझेंगे कि प्रश्न पूछने वाला जरूर खुद ट्रान्सफर कर देवता बना सकते होंगे। और तो कोई पूछ नहीं सकते। वह भक्ति मार्ग ही अलग है। भक्ति का फल क्या है? वह है ज्ञान। सतयुग-त्रेता में भक्ति होती नहीं। ज्ञान से आधा कल्प दिन, भक्ति से आधा कल्प रात। मानने वाले होंगे तो मानेंगे। न मानने वाले तो ज्ञान को भी नहीं मानेंगे तो भक्ति को भी नहीं मानेंगे। सिर्फ पैसा कमाना ही जानते हैं।तुम बच्चे तो योगबल से अब राजाई स्थापन कर रहे हो श्रीमत पर। फिर आधा कल्प के बाद राज्य गँवाते भी हो। यह चक्र चलता ही रहता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. बहुतों का कल्याण करने के लिए अपनी जबान बहुत मीठी बनानी है। मीठी जबान से सर्विस करनी है। सहनशील बनना है।

2. कर्मो की गहन गति को समझ विकारों पर जीत पानी है। जगतजीत देवता बनना है। आत्म-अभिमानी बन क्रिमिनल दृष्टि को सिविल बनाना है।

वरदान:-

ब्राह्मण जन्म की जन्मपत्री को जान सदा खुशी में रहने वाले श्रेष्ठ भाग्यवान भव

ब्राह्मण जीवन नया जीवन है, ब्राह्मण आदि में देवी-देवता हैं और अभी बी.के. हैं। ब्राह्मणों की जन्म पत्री में तीनों ही काल अच्छे से अच्छा है। जो हुआ वह भी अच्छा और जो हो रहा है वो और अच्छा और जो होने वाला है वह बहुत-बहुत अच्छा। ब्राह्मण जीवन की जन्मपत्री सदा ही अच्छी है, गैरन्टी है। तो सदा इसी खुशी में रहो कि स्वयं भाग्य विधाता बाप ने भाग्य की श्रेष्ठ रेखा खींच दी, अपना बना लिया।

स्लोगन:-

एकरस स्थिति का अनुभव करना है तो एक बाप से सर्व सम्बन्धों का रस लो।

शिवरात्रि (Shivratri Slogans in Hindi)

Below are slogans for Shivatri (decent of the incorporeal God Shiv, the Supreme father of all Souls). Maha Shivratri is clebrated in India since ancient time as a remembrance of God’s coming.

Here are slogans to imbibe in your own life and to inspire others. To download/print, here is the PDF version. Do SHARE this blog post to many in your connections.

Shivratri

शिवजयंती (शिवरात्रि) स्लोगन

सर्व पर्वो में पर्व महान

शिवजयंती है सर्व महान।

सव सत्यों में सत्य महान

शिव हैं गीता के भगवान।

शिवजयंती फिर से है आई

लाखों लाख मुबारके बधाई।

स्वयं शिव परमात्मा इस धरा पर आते हैं।

ब्रह्मा तन साकार ले सत्य ज्ञान सुनाते हैं।

शिव निराकार ज्योतिविन्द हैं।

सर्वगुणों में वे तो सिन्धु हैं।

शिव ज्ञान की गंगा बहाते

शिव धरा को स्वर्ग बनाते।

शिव में समाया संसार है,

शिव महिमा अपरंपार है।

शिव दुखहर्ता सुख कर्ता हैं,

शिव सर्व के मात-पिता भर्ता हैं।

शिव गति-सद्गति दाता हैं,

शिव भाग्यविधाता वरदाता हैं।

शिव मानव को देव बनाते,

शिव धरा को स्वर्ग बनाते।

Shivratri of Shiv baba

शिव काल के पंजे से छुड़ाने वाले हैं।

शिव जीवन नैया पार लगाने वाले हैं।

शिव का हुआ है धरा पर आगमन

करो अब अज्ञान निद्रा से जागरण।

भारत भू पर शिव पधारे

भर लो भाग्य के भण्डारे।

शिव को जानो, पहचानो, उनसे योग लगा लो

शिव बहा रहे ज्ञान-गंगा, खुद को पावन वना लो ।

जीवन नैया कर दे शिव के हवाले

जैसे वो चाहे वैसे इसको संभाले ।

शिव सबके भाग्य जगाते

शिव से जोड़ लो दिल के नाते ।

इस शिवरात्रि पर रहो नशे से दूर

शिव कर देंगे सुख-शान्ति से भरपूर ।

आज शिवमय है धरा और शिवमय है गगन

शिवमय हुई दिशायें, शिवमय हर इक मन ।

नशे की आदत है गर कोई बीड़ी, शराब, गुटखा, पान यही तो अक धतूरे हैं।

कर दें इन्हें शिव को दान

तभी इस शिवरात्रि पर पायेंगे भोलेनाथ से वरदान।

अज्ञान अंधेरा मन का हटाकर

ज्ञान का दीपक जलायें

खुद को जानें

शिव को पहचानें

तब सच्ची शिवरात्रि मनायें

शिव तो निराकार ज्योतिबिन्दुस्वरूप

नहीं उनका देह का रूप

फिर क्यों ये इल्जाम लगाया है।

शिव ने भांग धतूरा खाया है।

~~~ Useful links ~~~

PDF version of this Slogans

Maha Shivratri – Everything about

Article – Why is Shiva’s birth shown in Ratri?

PDF – Spiritual Significance of Shivratri

Revelations from Gyan Murli

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Understanding relationships: Love, God, self.

Question asked via email regarding the situation with boyfriend and personal health issues.

Original Question

Om Shanthi
I am Lakshmi from Bangalore, currently I am working and I am 23 years.I started following Brahma Kumaris from my 5th standard later due to my studies I had to study in residential school,I remembered Baba in every thing and I used to follow most of the dharan. I came home after 12th std and joined engineering college.In my 2nd semester I got confused about my past and about Brahma Kumaris and few deaths happened during that time I was admitted in hospital and was diagnosed that I have bipolar mood disorder.I got episodes around 5 times and lastly it happened in April 2018,I went alone to Tirupathi,I was scolding everyone badly and when I came back my family had already given missing complaint and I was put in a rehabilitation centre for 20 days during this time I didn’t use phone I did Not speak to any of my family members and friends.During this time the boy whom I loved told my mother that he would drop from the relationship as I was not normal in mind.We loved each other and he cared me a lot previously when I was admitted he used to come to hospital and he took care of me.now he says he doesn’t love me.
I started listening to Shivani didi s talk and she said if something goes wrong in a reationship if one person creates a thought that everything is fine then one day relationship will heal,now can I create thought that everything is ok between that boy and me so that we would be like how we were before?
What thought I need to have and how I have to think please help me please.
Thanking you.

Our Response

To: Lakshmi
From: Prajapita BrahmaKumari Ishwariya Vishwa Vidhyalay (Godly Spiritual University)

Dear Divine Sister

Your email letter is received and read. Here is our response.

You have come in contact with Baba at a very young age haven’t you? You say you have been following and doing all the Dharanas. Have you taken the 7 days course and have you been reading Murlis regularly? If you have been paying attention you will understand that this is a very important time we are living in currently. It is called sangam yug and there is a lot of emphasis given on the aspect of purity.

As per Srimat, marriage is not allowed during this time and it is best to remain kumari. Shivbaba only gives advice, then it is up to the children’s choice. Read this article on celibacy.
https://www.brahma-kumaris.com/single-post/celibacy-is-raja-yoga-way-of-Life

Now as per your situation, you need to be alert and self-introspect, do you really need that kind of a relationship where the boy is ready to leave after discovering your sickness? Don’t you want to be loved and accepted unconditionally? This is possible only by sweet baba. So instead of thinking about how to get him back, try to channel your time and energy on strengthening your relationship with the almighty. He will never leave you but instead fill you with so much love and power that you will be able to heal yourself and give it everyone around you. Isn’t that beautiful?

~ ADVICE ~

  1. Wake up early in the morning and practice this swaman (self-respect affirmation) daily

2. Practice Rajyog meditation early morning where you have a conversation with Shivbaba and gradually you will notice that he will give you solution to all your problems.

3. Visit your nearest Rajyoga center regularly
Centre Locator (near you): http://www.brahmakumaris.org/centre-locator

4. Murli is the source of all attainments of knowledge and spiritual powers. You will be definitely benefited if you bring the Murli in your practical life.
Visit : Daily murli in 25 languages -> http://www.babamurli.com/

5. Remember that you are one of the lucky ones who got the chance to come close to Shivbaba at a very young age. Realize the importance, hold on to it and rise high. A beautiful world (Satyug) is waiting for you.

* Related Post *

Healing Past relationships: https://bkarticles.blog/2019/02/16/healing-past-relationship-hurt/

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About Us: https://www.brahma-kumaris.com/about-us
7 days course online: https://www.brahma-kumaris.com/rajyoga-course
What is Murli?: https://www.brahma-kumaris.com/what-is-murli

Hope this helps. Do email and let us know of your progress.

Get our Mobile apps -> http://bit.ly/BkAndroidApps

Accha
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23 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today’s murli poem)

* मुरली कविता दिनांक 23.2.2019 *

निराकार शिव की बायोग्राफी औरों को सुनाओ
हीरे तुल्य शिव जयन्ती का अर्थ सबको बताओ

शिवबाबा ही आकर आत्मा रूपी दीपक जगाते
इसी कारण हम शिव जयन्ती धूमधाम से मनाते

पूछो दुनिया वालों को शिव कब धरा पर आया
आकर उसने धरती पर कौनसा कर्तव्य निभाया

धूमधाम और उमंग से तुम शिवजयन्ती मनाओ
देवताओं की बायोग्राफी मन्दिर जाकर सुनाओ

ज्ञान घृत से आत्मा रूपी दीपक रखो जलाकर
सबको प्रकाश में लाओ अज्ञान अंधेरा मिटाकर

श्रेष्ठ स्मृति के द्वारा ही वायुमण्डल श्रेष्ठ बनाओ
सबका सहयोग करके तुम विश्व प्रिय बन जाओ

धारण कर लो अपनी अचल स्थिति का आसन
तभी मिलेगा तुम्हें सारे विश्व का राज्य सिंहासन

*ॐ शांति*

22 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today’s murli poem)

* मुरली कविता दिनांक 22.2.2019 *

ब्राह्मण छोटी की स्मृति हर्षित रहने का आधार
खुद से बात करके तुम पाओगे खुशियां अपार

पानी है बाप की शरण तो नष्टोमोहा बन जाओ
मित्र सम्बन्धियों में कभी बुद्धि नहीं भटकाओ

सबसे बुद्धियोग तोड़कर बाप में बुद्धि लगाओ
सेवा लायक बनकर तुम शरण बाप की पाओ

दुख जीवन में तब आता पतित जब बन जाते
जीवन में सुख आता जब पावन हम बन जाते

हमें सतोप्रधान बनाने वाला राजयोग है महान
राजयोग सिखलाता हमको गीता का भगवान

भगवान हमको पढ़ाते ये निश्चय जिसे हो जाता
नष्टोमोहा बनकर वो अमृत पिता और पिलाता

सर्विसेबल बच्चे ही बाप की दिल पर चढ़ पाते
बाप शरण में लेकर उनको विष पीने से बचाते

औरों को ज्ञान समझाकर मन में खुश ना होना
बाप को याद करके ही तुम रोज रात को सोना

माया शत्रु का विघ्न हर बच्चे के सम्मुख आता
जो माया को जीते वो कर्मातीत अवस्था पाता

सदा हर्षित रहने के लिए रूहानी सर्विस करना
श्रीमत पर अपना और सबका कल्याण करना

पुराने जग से दिल हटाकर नष्टोमोहा बन जाना
सच्चे दिल से सच्ची प्रीत एक बाप से निभाना

अपने कर्म और योग में सन्तुलन रखते जाओ
बाप की ब्लेसिंग अपने हर कर्म में पाते जाओ

कर्म अगर अच्छा है तो सबके मन को भाएगा
अच्छा कर्म करने वाला सबकी दुआएँ पाएगा

संकल्पों को स्टॉप करने का अभ्यास बढ़ाओ
अपनी कर्मातीत अवस्था सहज समीप लाओ

*ॐ शांति*

21 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today’s murli poem)

* मुरली कविता दिनांक 21.2.2019 *

आत्म अभिमान तुम्हें विश्व का मालिक बनाता
देह अभिमान तुम्हें कंगाली की तरफ ले जाता

खुद को एक्टर समझकर अपना पार्ट बजाओ
अशरीरीपन का तुम बार बार अभ्यास बढ़ाओ

भाई भाई की दृष्टि रखकर पावन बनते जाओगे
क्रिमिनल ख्यालातों से सहज ही मुक्ति पाओगे

अपने ही बेसमझ बच्चों को बाप यही समझाते
पुनर्जन्म में आकर तुम बच्चे कलाहीन हो जाते

बाप अपने बच्चों की इसी बात का वण्डर खाते
अच्छे अच्छे बच्चे भी तकदीर को लकीर लगाते

दैवी गुणों के बारे में भले ही सबको ज्ञान सुनाते
ज्ञान को ना समझकर अवगुण खुद ही अपनाते

अशरीरीपन का अभ्यास कर दृष्टि शुद्ध बनाओ
आत्मा बनकर तुम आत्मा से बात करते जाओ

अपने अन्दर ज्ञान योग की ताक़त को बढ़ाओ
दैवीगुणों की सम्पन्नता से चरित्र सुधारते जाओ

विश्व कल्याण की जिम्मेवारी उमंग से निभाओ
आलस्य और अलबेलेपन से मुक्ति पाते जाओ

उमंग और उत्साह तुम्हें सेवा में अथक बनाएगा
चेहरे और चलन से औरों का उत्साह बढ़ाएगा

समय प्रमाण शक्तियों का उपयोग करते जाओ
ज्ञानी योगी तू आत्मा का टाइटल बाप से पाओ

*ॐ शांति*

23 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today Murli Poem)

Hindi Poem from today’s murli. Aaj ki gyan murli se ek Kavita 22 Feb 2019. This poem is daily written on day’s murli by Brahma Kumar (BK) Mukesh (from Rajasthan). To read more Hindi poems written, visit Murli Poems page.

Murli poems written in hindi

* मुरली कविता दिनांक 23.2.2019 *

निराकार शिव की बायोग्राफी औरों को सुनाओ

हीरे तुल्य शिव जयन्ती का अर्थ सबको बताओ

शिवबाबा ही आकर आत्मा रूपी दीपक जगाते

इसी कारण हम शिव जयन्ती धूमधाम से मनाते

पूछो दुनिया वालों को शिव कब धरा पर आया

आकर उसने धरती पर कौनसा कर्तव्य निभाया

धूमधाम और उमंग से तुम शिवजयन्ती मनाओ

देवताओं की बायोग्राफी मन्दिर जाकर सुनाओ

ज्ञान घृत से आत्मा रूपी दीपक रखो जलाकर

सबको प्रकाश में लाओ अज्ञान अंधेरा मिटाकर

श्रेष्ठ स्मृति के द्वारा ही वायुमण्डल श्रेष्ठ बनाओ

सबका सहयोग करके तुम विश्व प्रिय बन जाओ

धारण कर लो अपनी अचल स्थिति का आसन

तभी मिलेगा तुम्हें सारे विश्व का राज्य सिंहासन

*ॐ शांति*

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22 Feb 2019 आज की मुरली से कविता (Today Murli Poem)

Hindi Poem from today’s murli. Aaj ki gyan murli se ek Kavita 22 Feb 2019. This poem is daily written on day’s murli by Brahma Kumar (BK) Mukesh (from Rajasthan). To read more Hindi poems written, visit Murli Poems page.

* मुरली कविता दिनांक 22.2.2019 *

ब्राह्मण छोटी की स्मृति हर्षित रहने का आधार

खुद से बात करके तुम पाओगे खुशियां अपार

पानी है बाप की शरण तो नष्टोमोहा बन जाओ

मित्र सम्बन्धियों में कभी बुद्धि नहीं भटकाओ

सबसे बुद्धियोग तोड़कर बाप में बुद्धि लगाओ

सेवा लायक बनकर तुम शरण बाप की पाओ

दुख जीवन में तब आता पतित जब बन जाते

जीवन में सुख आता जब पावन हम बन जाते

हमें सतोप्रधान बनाने वाला राजयोग है महान

राजयोग सिखलाता हमको गीता का भगवान

भगवान हमको पढ़ाते ये निश्चय जिसे हो जाता

नष्टोमोहा बनकर वो अमृत पिता और पिलाता

सर्विसेबल बच्चे ही बाप की दिल पर चढ़ पाते

बाप शरण में लेकर उनको विष पीने से बचाते

औरों को ज्ञान समझाकर मन में खुश ना होना

बाप को याद करके ही तुम रोज रात को सोना

माया शत्रु का विघ्न हर बच्चे के सम्मुख आता

जो माया को जीते वो कर्मातीत अवस्था पाता

सदा हर्षित रहने के लिए रूहानी सर्विस करना

श्रीमत पर अपना और सबका कल्याण करना

पुराने जग से दिल हटाकर नष्टोमोहा बन जाना

सच्चे दिल से सच्ची प्रीत एक बाप से निभाना

अपने कर्म और योग में सन्तुलन रखते जाओ

बाप की ब्लेसिंग अपने हर कर्म में पाते जाओ

कर्म अगर अच्छा है तो सबके मन को भाएगा

अच्छा कर्म करने वाला सबकी दुआएँ पाएगा

संकल्पों को स्टॉप करने का अभ्यास बढ़ाओ

अपनी कर्मातीत अवस्था सहज समीप लाओ

*ॐ शांति*

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आज की मुरली 22 Feb 2019 BK murli in Hindi

BrahmaKumaris murli today Hindi Aaj ki murli Madhuban 22-02-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे – सदा याद रखो कि हम ब्राह्मण चोटी हैं, पुरूषोत्तम बन रहे हैं तो हर्षित रहेंगे, अपने आप से बातें करना सीखो तो अपार खुशी रहेगी।”

प्रश्नः-

बाप की शरण में कौन आ सकते हैं? बाप शरण किसको देते हैं?

उत्तर:-

बाप की शरण में वही आ सकते हैं जो पूरा-पूरा नष्टोमोहा हो। जिनका बुद्धियोग सब तऱफ से टूटा हुआ हो। मित्र सम्बन्धियों आदि में बुद्धि की लागत न हो। बुद्धि में रहे मेरा तो एक बाबा दूसरा न कोई। ऐसे बच्चे ही सर्विस कर सकते हैं। बाप भी ऐसे बच्चों को ही शरण देते हैं।

ओम् शान्ति।

यह है रूहानी बाप, टीचर, गुरू। यह तो बच्चे अच्छी रीति समझ गये हैं दुनिया इन बातों को नहीं जानती। भल सन्यासी कहते हैं शिवोहम्। तो भी ऐसे नहीं कहेंगे कि हम बाप टीचर गुरू हैं। वह सिर्फ कहते हैं शिवोहम् तत् त्वम्। परमात्मा सर्वव्यापी है तो हरेक बाप टीचर गुरू हो जाये। ऐसे तो कोई समझते भी नहीं। मनुष्य अपने को भगवान, परमात्मा कहलायें यह तो बिल्कुल ही रांग है। बच्चों को जो बाप समझाते हैं वह तो बुद्धि में धारण होता है ना। उस पढ़ाई में कितनी सब्जेक्ट होती हैं, ऐसे नहीं सब सब्जेक्ट स्टूडेन्ट की बुद्धि में रहती हैं। यहाँ जो बाप पढ़ाते हैं वह एक सेकेण्ड में बच्चों की बुद्धि में आ जाता है। तुम रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त का ज्ञान सुनाते हो। तुम ही त्रिकालदर्शी वा स्वदर्शन चक्रधारी बनते हो। उस जिस्मानी पढ़ाई में सब्जेक्ट बिल्कुल अलग हैं। तुम सिद्ध कर समझाते हो, सर्व का सद्गति दाता वह एक ही बाप है। सभी आत्मायें परमात्मा को याद करती हैं। कहती हैं ओ गॉड फादर। तो ज़रूर बाप से वर्सा मिलता होगा। वह वर्सा खोने से दु:ख में आ जाते हैं। यह सुख दु:ख का खेल है। इस समय सभी पतित दु:खी हैं। पवित्र बनने से सुख ज़रूर मिलता है। सुख की दुनिया बाप स्थापन करते हैं। बच्चों को बुद्धि में यह रखना है कि हमको बाप समझाते हैं, नॉलेजफुल एक बाप ही है। सृष्टि के आदि मध्य अन्त का ज्ञान बाप ही देते हैं। और सभी धर्म जो स्थापन हुए हैं वह अपने समय पर आयेंगे। यह बातें और कोई की बुद्धि में नहीं हैं। तुम बच्चों के लिए बाप ने यह पढ़ाई बिल्कुल सहज रखी है। सिर्फ थोड़ा विस्तार से समझाते हैं। मुझ बाप को याद करो तो तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे।

योग की महिमा बहुत है। प्राचीन योग भारत का गाया हुआ है। परन्तु योग से फायदा क्या हुआ था, यह किसको पता नहीं है। यह है गीता का वही योग जो निराकार भगवान सिखलाते हैं। बाकी जो भी सिखलाते हैं वह मनुष्य हैं, देवताओं के पास तो योग की बात ही नहीं। यह हठयोग आदि सब मनुष्य सिखलाते हैं। देवतायें न सीखते हैं, न सिखलाते हैं। दैवी दुनिया में योग की बात नहीं। योग से सब पावन बन जाते हैं। वह ज़रूर यहाँ बनेंगे। बाप आते ही हैं संगम पर नई दुनिया बनाने। अभी तुम पुरानी दुनिया से नई दुनिया में बदली हो रहे हो। यह किसको समझाना भी वन्डर है। हम ब्राह्मण चोटी हैं, सतयुग और कलियुग के बीच में हैं ब्राह्मण चोटी। इसको ही संगमयुग कहा जाता है, जिसमें तुम पुरूषोत्तम बन रहे हो। यह बच्चों की बुद्धि में रहे कि हम पुरूषोत्तम बनते हैं तो सदैव हर्षित रहेंगे। जितना सर्विस करेंगे उतना हर्षित रहेंगे। कमाई करनी और करानी है। जितना प्रदर्शनी में सर्विस करेंगे तो सुनने वालों को भी सुख मिलेगा। अपना और दूसरों का कल्याण होगा। छोटे सेन्टर पर भी मुख्य 5-6 चित्र ज़रूर चाहिए। उन पर समझाना सहज है। सारा दिन सर्विस ही सर्विस। मित्र सम्बन्धियों तऱफ कोई भी लागत नहीं होनी चाहिए। जो इन ऑखों से देख रहे हो उन सबका विनाश होना है। बाकी जो दिव्य दृष्टि से देखते हो उनकी स्थापना हो रही है। ऐसे अपने से बातें करो तो तुम पक्के हो जायेंगे। बेहद के बाप से मिलने की खुशी होनी चाहिए। कोई राजा के पास जन्म लेता है तो कितना फखुर में रहता है।

तुम बच्चे स्वर्ग के मालिक बन रहे हो। हर एक अपने लिए मेहनत कर रहे हैं। बाप सिर्फ कहते हैं काम चिता पर बैठ तुम काले हो गये हो। अब ज्ञान चिता पर बैठो तो गोरे बन जायेंगे। बुद्धि में यही चिन्तन चलता रहे, भल ऑफिस में काम करते रहो, याद करते रहो। ऐसे नहीं फुर्सत नहीं है। जितनी फुर्सत मिले रूहानी कमाई करो। कितनी बड़ी कमाई है। हेल्थ वेल्थ दोनों एक साथ मिलती हैं। एक कहानी है अर्जुन और भील की। ऐसे गृहस्थ व्यवहार में रहकर ज्ञान-योग में अन्दर वालों से भी तीखे जा सकते हैं। सारा मदार याद पर है। यहाँ सब बैठ जायेंगे तो सर्विस कैसे करेंगे। रिफ्रेश होकर सर्विस में लग जाना है। सर्विस का ख्याल रखना चाहिए। बाबा तो प्रदर्शनी में जा न सके क्योंकि बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। बाबा की आत्मा और इनकी आत्मा इकट्ठी है। यह वन्डरफुल युगल है। इस युगल को तुम बच्चों के सिवाए कोई जान न सके। अपने को युगल भी समझते हैं फिर भी कहते हैं मैं एक ही बाबा का सिकीलधा बच्चा हूँ। इस लक्ष्मी-नारायण के चित्र को देखकर बहुत खुशी होती है। हमारा दूसरा जन्म यह है, हम गद्दी पर जरूर बैठेंगे। तुम भी राजयोग सीख रहे हो, एम आब्जेक्ट सामने खड़ी है। इन्हें तो खुशी है कि मैं बाबा का सिकीलधा बच्चा हूँ। फिर भी सदैव याद ठहरती नहीं। और-और तऱफ ख्यालात चले जाते हैं। ड्रामा का लॉ नहीं जो एकदम याद ठहर जाए और कोई ख्याल न आये। माया के तूफान याद नहीं करने देते। जानता हूँ हमारे लिए बहुत सहज है, क्योंकि बाबा की प्रवेशता है। बाबा का नम्बरवन सिकीलधा बच्चा हूँ। पहले नम्बर में राजकुमार बनूँगा फिर भी याद भूल जाती है। अनेक प्रकार के ख्यालात आ जाते हैं। यह है माया। जब इस बाबा को अनुभव हो तब तो तुम बच्चों को समझा सके। यह ख्यालात बन्द तब होंगे जब कर्मातीत अवस्था होगी। आत्मा सम्पूर्ण बन जाए फिर तो यह शरीर रह न सके। शिवबाबा तो सदैव प्योर ही प्योर है। पतित दुनिया और पतित शरीर में आकर पावन बनाने का पार्ट भी इनका ही है। ड्रामा में बंधायमान हैं।

तुम पावन बन गये तो फिर नया शरीर चाहिए। शिवबाबा को अपना शरीर तो है नहीं। इस तन में इस आत्मा का महत्व है। उनका रखा क्या है! वह तो मुरली चलाकर चले जाते हैं। वह फ्री हैं। कभी कहाँ, कभी कहाँ चले जायेंगे। बच्चों को भी फील होता है कि यह शिवबाबा मुरली चला रहे हैं। तुम बच्चे समझते हो हम बाप को मदद करने के लिए इस गॉडली सर्विस पर खड़े हैं। बाप कहते हैं हम भी अपना स्वीट होम छोड़कर आये हैं। परमधाम अर्थात् परे ते परे धाम है मूलवतन। बाकी खेल सारा सृष्टि पर चलता है। तुम जानते हो यह वन्डरफुल खेल है। बाकी दुनिया एक है।वो लोग चांद पर जाने की कोशिश करते हैं, यह तो साइन्स का बल है। साइलेन्स के बल से हम जब साइन्स पर जीत पाते हैं तब साइन्स भी सुखदाई बन जाती है। यहाँ साइन्स सुख भी देती है तो दु:ख भी देती है। वहाँ तो सुख ही सुख है। दु:ख का नाम नहीं। ऐसी बातें सारा दिन बुद्धि में रहनी चाहिए। बाबा को कितने ख्यालात रहते हैं। बाँधेलियाँ विष पर कितनी मारें खाती हैं। कोई तो मोह वश फिर फँस पड़ते हैं। निश्चयबुद्धि वाले झट कहेंगे हमको अमृत पीना है, इसमें नष्टोमोहा चाहिए।

पुरानी दुनिया से दिल उठ जानी चाहिए। ऐसे ही सर्विसएबुल दिल पर चढ़ सकते हैं। उनको शरणागति दे सकते हैं। कन्या पति की शरण में जाती है, विष बिगर नहीं रखते। फिर बाप को शरण लेना पड़ता है। परन्तु एकदम नष्टोमोहा चाहिए। पतियों का पति मिला अब उनसे हम बुद्धियोग की सगाई करते हैं। बस मेरा तो एक दूसरा न कोई। जैसे कन्या की पति से प्रीत जुट जाती है, यह है आत्मा की प्रीत परमात्मा से। उनसे दु:ख मिलता है, इनसे सुख मिलता है। यह है संगम, इसको कोई जानता नहीं। तुमको कितनी खुशी होनी चाहिए। हमको खिवैया अथवा बागवान मिला है, जो हमको फूलों के बगीचे में ले जाते हैं। इस समय सभी मनुष्य काँटे मिसल बन पड़े हैं। सबसे बड़ा काँटा है काम का। पहले तुम निर्विकारी फूल थे, धीरे-धीरे कला कम हो गई अब तो बड़े काँटे हो गये हो। बाबा को बबुलनाथ भी कहते हैं। तुम जानते हो असली नाम शिव है। बबुलनाथ नाम रखते हैं क्योंकि काँटों को फूल बनाते हैं। भक्ति मार्ग में बहुत नाम रखते हैं। वास्तव में नाम एक ही शिव है। रूद्र ज्ञान यज्ञ वा शिव ज्ञान यज्ञ बात एक ही है। रूद्र यज्ञ से विनाश ज्वाला निकली और श्रीकृष्णपुरी अथवा आदि सनातन देवी देवता धर्म की स्थापना हुई। तुम इस यज्ञ द्वारा मनुष्य से देवता बनते हो।

चित्र भी वन्डरफुल बनाते हैं। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। यह सब बातें तुम जानते हो कि ब्रह्मा सरस्वती ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। यह निश्चय है। लक्ष्मी-नारायण ही 84 जन्मों के बाद ब्रह्मा सरस्वती बनते हैं। मनुष्य तो ऐसी बातें सुनकर चक्रित होते होंगे। खुशी में भी आते होंगे। परन्तु माया कम नहीं है। काम महाशत्रु है। माया नाम रूप में फँसाए गिरा देती है। बाप को याद करने नहीं देती। फिर वह खुशी कम हो जाती है। इसमें खुश नहीं होना चाहिए कि हम बहुतों को समझाते हैं, पहले देखना है बाबा को कितना याद करता हूँ। रात को बाबा को याद करके सोता हूँ या भूल जाता हूँ। कोई बच्चे तो पक्के नेमी भी हैं।तुम बच्चे बहुत लक्की हो। बाप के ऊपर तो बहुत बोझ हैं। परन्तु फिर भी रथ को रियायत मिल जाती है। ज्ञान और योग भी है, इसके बिगर लक्ष्मी-नारायण पद कैसे पायेंगे। खुशी तो रहती है, हम अकेला बाप का बच्चा हूँ और फिर मेरे ढेर बच्चे हैं, यह नशा भी रहता है तो माया विघ्न भी डालती है। बच्चों को भी माया के विघ्न आते होंगे। कर्मातीत अवस्था आगे चलकर आनी है। यह बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। कहते हैं मीठे-मीठे बच्चे.. बाप तो प्यार का सागर है। इनकी आत्मा इकट्ठी है। यह भी प्यार करते हैं। समझते हैं जैसा कर्म मैं करुँगा, मुझे देख और भी करेंगे। बहुत मीठा रहना है। बच्चे बड़े सयाने चाहिए। इन लक्ष्मी-नारायण में देखो कितनी सयानप है। सयानप से विश्व का राज्य लिया है। प्रदर्शनी द्वारा प्रजा तो बहुत बनती है। भारत बहुत बड़ा है, इतनी सर्विस करनी है। दूसरा याद में रहकर विकर्म भी विनाश करने हैं। यह है कड़ा फुरना (फिकर)। हम तमोप्रधान से सतोप्रधान कैसे बनें? इसमें मेहनत है। सर्विस के चांस बहुत हैं। ट्रेन में बैज पर सर्विस कर सकते हो। यह बाबा यह वर्सा।

बरोबर 5 हज़ार वर्ष पहले भारत स्वर्ग था। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। फिर ज़रूर इनका राज्य आना चाहिए। हम बाबा की याद से पावन दुनिया का मालिक बन रहे हैं। ट्रेन में बहुत सर्विस हो सकती है। एक डिब्बे में सर्विस कर फिर दूसरे में जाना चाहिए। ऐसी सर्विस करने वाला ही दिल पर चढ़ेगा। बोलो, हम आपको खुशखबरी सुनाते हैं। तुम पूज्य देवता थे फिर 84 जन्म ले पुजारी बने। अब फिर पूज्य बनो। सीढ़ी अच्छी है, इनसे ही सतो रजो तमो स्टेज सिद्ध करनी है। स्कूल में पिछाड़ी में गैलप करने का शौक होता है। अब यहाँ भी समझाया जाता है जिन्हों ने टाइम वेस्ट किया है, उन्हों को गैलप कर सर्विस में लग जाना चाहिए। सर्विस की मार्जिन बहुत है। सर्विसएबुल बच्चियाँ बहुत निकलनी चाहिए, जिनको बाबा कहाँ भी भेज दे। मन्दिरों में सर्विस अच्छी होगी। देवता धर्म वाले झट समझेंगे। गंगा स्नान पर भी तुम समझा सकते हो, तो दिल पर लगेगा ज़रूर। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा हर्षित रहने के लिए रूहानी सर्विस करनी है, सच्ची कमाई करनी और करानी है। अपना और दूसरों का कल्याण करना है। ट्रेन में भी बैज पर सर्विस करनी है।

2) पुरानी दुनिया से दिल हटा लेनी है। नष्टोमोहा बनना है, एक बाप से सच्ची प्रीत रखनी है।

वरदान:- कर्म और योग के बैलेन्स द्वारा ब्लैसिंग का अनुभव करने वाले कर्मयोगी भव

कर्मयोगी अर्थात् हर कर्म योगयुक्त हो। कर्मयोगी आत्मा सदा ही कर्म और योग का साथ अर्थात् बैलेन्स रखने वाली होगी। कर्म और योग का बैलेन्स होने से हर कर्म में बाप द्वारा तो ब्लैसिंग मिलती ही है लेकिन जिसके भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं उनसे भी दुआयें मिलती हैं। कोई अच्छा काम करता है तो दिल से उसके लिए दुआयें निकलती हैं कि बहुत अच्छा है। बहुत अच्छा मानना ही दुआयें हैं।

स्लोगन:-

सेकेण्ड में संकल्पों को स्टॉप करने का अभ्यास ही कर्मातीत अवस्था के समीप लायेगा।

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