दादी प्रकाशमणी (कुमरका) का परिचय और जीवनी
Dadi Prakashmani biography in Hindi
दादी (बड़ी बहन) प्रकाशमणी (प्रकाश का हीरा या गहना) उर्फ कुमारका दादी प्रजापिता ब्रह्मा कुमारिस ईश्वरीय आध्यात्मिक विश्वविद्यालय की दूसरी मुख्य प्रशाशिका (leader)रही है l मममा के बाद साकार मे यज्ञ की प्रमुख, दादी प्रकाशमणी ही रही.l चाहे देश विदेश की सेवा की देखभाल हो, या ब्राह्मण परिवार मे कोई समस्या आए, तो परिवार के बड़े के पास ही जाते है ।
दादी 1969 से 2007 तक संस्था की मुख्य प्रशशिका रही l इसी समय मे बहुत गीता पाठशाला और बड़े सेंटर्स खुले l
दादी का लौकिक नाम रमा था । रमा का जन्म उत्तरी भारतीय प्रांत हैदराबाद, सिंध (पाकिस्तान) में 01 सितंबर 1922 को हुआ था । उनके पिता विष्णु के एक महान उपासक और भक्त थे l रमा का भी श्री कृष्णा के प्रति प्रेम और भक्ति भाव रहता था । रमा केवल 15 वर्ष की आयु मे पहली बार ओम मंडली के संपर्क में आई थीं, जिसे 1936 मे स्थापन क्या गया था । रमा को ओम मंडली मे पहली बार आने से पहले ही घर बैठे श्री कृष्ण का शक्षात्कार हुआ था, जहा शिव बाबा का लाइट स्वरूप भी दिखा था । इसलिए रमा को अस्चर्य हुआ, की यह क्या और किसने किया l शरूवात मे बहुतो को ऐसे शक्षात्कार हुए । यह 1937 का समय बहुत वंडरफुल समय रहा ।

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रमा की दीवाली (भारत में एक त्यौहार) के दौरान छुट्टियां थीं और इसलिए उनके लॉकिक पिता ने रमा (दादी) से अपने घर के पास सत्संग जाने के लिए कहा । असल में, इस आध्यात्मिक सभा (सत्संग) का गठन दादा लेखराज (जिन्हे अब ब्रह्मा बाबा के नाम से जाना जाता है) द्वारा किया गया था, जो भगवान स्वयं (शिव बाबा) द्वारा दिए गए निर्देशों पर आधारित थे। इसे ओम मंडली के नाम से जाना जाता था।
”पहले दिन ही जब मे बापदादा से मिली और धृिस्टी ली, तो एक अलग ही दिव्य अनुभव हुआ” – दादी प्रकाशमणी। उन्होंने एक विशाल शाही बगीचे में श्री कृष्ण का दृश्य देखा । दादा लखराज (ब्रह्मा) को देखते हुए उन्हें वही दृष्टि मिली। उसने तुरंत स्वीकार किया कि यह कोई मानव काम नहीं कर रहा है।
संक्षेप में परिचय
उन्ही दीनो मे बाबा ने रमा क ‘प्रकाशमणी’ नाम दिया l तो ऐसे हुआ था दादी प्रकाशमणी का अलौकिक जन्म l
1939 मे पूरा ईश्वरीय परिवार (ओम मंडली) कराची (पाकिस्तान) मे जाकर बस गया l 12 साल की तपस्या के बाद मार्च 1950 मे (भारत के स्वतंत्र होने के बाद) ओम मंडली माउंट अबू मे आई, जो अभी भी प्रजापिता ब्रह्मा कुमारीज का मुख्य सेंटर है l 1952 से मधुबन – माउंट अबू से पहली बार ईश्वरिया सेवा शरु की गयी l ब्रह्मा कुमारिया जगह कगाह जाकर यह ज्ञान सुनती और धारणा करवाती रही l दादी प्रकाशमनी भी यही सेवा मे जाती थी l ज़्यादा तर दादी जी मूबाई मे ही रहती थी l
प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने बाद से दादी प्रकाशमणि मधुबन से ही यज्ञ की संभाल करने लगी। जैसे की प्रचलित है की अव्यक्त होने से पहले ही ब्रह्मा बाबा ने दादी को यज्ञ की समस्त जिम्मेवारी दे दी थी। दादी के समर्थ नेतृत्व में संस्था (यज्ञ) वृद्धि को पाया और विदेशो में भी सेंटर खुले।
२००७ तक यज्ञ का विस्तार हो गया और अगस्त मॉस २००७ में दादी ने शरीर छोड़ा। दादी कुमारका की यादगार में मधुबन में ‘प्रकाश स्तम्भ‘ बनाया गया है, जिसपर दादी की दी हुई शिक्षाए लिखी भी गयी है।
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