Maha Shivratri Hindi

शिवरात्रि का यथार्थ अर्थ और महत्व (Shivratri Hindi)

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महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

महा अर्थार्थ ‘महान’, रात्रि अर्थार्थ ‘रात’ और जयन्ती अर्थार्थ ‘जन्म दिवस’. शिव आते हैं जब रात बहुत घनी होती है। परम-आत्मा का नाम है शिव, जिसका अर्थ है सदा ‘कल्याणकारी’ वो जो सभी का कल्याण करता है और हम उसके बच्चे हैं।

शिवरात्रि व शिवजयन्ती भारत में द्वापुरयुग से मनाई जाती है। यह दिन हम ईश्वर के इस धरा पर अवतरण के समय की याद में मनाते हैं।

शिव के साथ रात शब्द इसलिए जुड़ा है क्योकि वो अज्ञान की अँधेरी रत में आते हैं। जब सारा संसार अज्ञान रात्रि में होता है, जब सभी आत्माएं 5 विकारो के प्रभाव से पतित हो जाती हैं, जब पवित्रता और शान्ति का सत्य धर्म व स्वम् की आत्म पहचान भुला दी जाती है। सिर्फ ऐसे समय पर, हमे जगाने, समग्र मानवता के उत्थान व सम्पूर्ण विश्व में फिर से शान्ति का धर्म स्थापित करने परमात्मा आते हैं।

( भगवत गीता श्लोक :

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भव- ति भारत ।

अभ्युत्थान- मधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्- ॥४-७॥

परित्राणाय- साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्- ।

धर्मसंस्था- पनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥)

साथ ही महाशिवरात्रि के साथ जुड़े हुए आध्यात्मिक महत्व समझने का ये सबसे अच्छा अवसर है। शिव-लिंग परमात्मा शिव के ज्योति रूप को दर्शाता है। परमात्मा कोई मनुष्य नहीं है और न ही उसके पास कोई शारीरिक आकर है। भगवन शिव एक सूक्षम, पवित्र व स्व दीप्तिमान दिव्य ज्योति पुंज हैं। इस ज्योति को एक अंडाकार आकर से दर्शाया गया है। इसीलिए उन्हें ज्योर्ति-लिंग के रूप में दिखाया गया है “ज्योति का प्रतीक” . वो सत्य है, कल्याणकारी और सबसे खूबसूरत है तभी उसे सत्यम-शिवम्-सुंदरम कहा जाता है। वो सात-चित-आनंद सवरूप भी है।

शिव जयंती के 100 वर्ष बाद नए संसार की शुरुवात होती है। परम-पिता परम-आत्मा ही स्वर्ग रचते है। सम्पूर्ण विश्व और मानवता को परिवर्तन होने में 100 साल ला समय लगता हैं। यह सबस महान कार्य है। अगर हम सभी मुख्या पार्टधारी आत्माओं जैसे की अब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट आदि का पार्ट दिखें तो ये निकल कर आता है की वे सभी परमात्मा के संदेश / पैगाम देने वाले संदेशी/पैगम्बर थे उनसभी ने अपना धरम स्थापित किया और परमात्मा के बारे में अपना-अपना दृष्टिकोण बताया और जीवन जीने की कला सिखाई। बहुत से महापुरषो ने इतिहास को बदला है।कईयों ने शांति के सन्देश से, कईयों ने, अपने ज्ञान और कईयों न जंगो से। परन्तु कुछ हद तक। धर्म सत्ता अभी भी है पर दुःख भी है क्योकि संसार पतन की और है। (आध्यात्मिक दृष्टिकोण से). कोई भी इस कितनी भी बड़ी कोशिशे हो पर, संसार का उत्थान कोई कर नहीं सकता।

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क्योकि यह कार्य कोई मनुष्य का नहीं है। जिसे सारे धर्म और संसार प्रार्थना करता है यह उसका काम है। बाकि सभी भगवन की और अलग अलग रस्ते बताते हैं। यह समझना होगा कि हम सभी मदद के लिए भगवान को प्रार्थना करते हैं, इसलिए यह बिलकुल है की हम सभी ने पहले भी कई बार उसकी मदद का अनुभव किया है। जबकि हम उससे ख़ुशी और शांति मांगते हैं तो इससे यह सिद्ध होता है कि वो इन सब का स्त्रोत व दाता है।तो प्रश्न यह है कि कब परम-आत्मा आते हैं और हमें अपना वर्सा देकर ये सब करते है? और इतना की इंसान आज भी उसे याद करता है, उसकी पूजा व प्रार्थना करता है? चलिए इन विडिओ के माध्यम से हम जानते हैं।

परमात्मा शिव त्रिमूर्ति हैं। वे ब्रह्मा द्वारा सवर्णिम युग की नव विश्व व्यवस्था करते हैं। वे उस विश्व की पलना विष्णु द्वारा करते हैं और शंकर द्वारा पुरानी कलयुगी सृष्टि जो कि अधर्म पूर्ण हो जाती है उसका विनाश कराते हैं। शिवरात्रि के प्रसंग में रात को अज्ञानता से दर्शया गया है। ज्ञान की रौशनी जहाँ लोप है। इसी अज्ञान के अंधियारे के कारन ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, व अहंकार का सर्वव्याप्त अस्तित्व है। यह रात, अधर्म का चरम है। आज अशांति, अधर्म, साधारण व गलत कर्म करना ही हमारे की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है, परन्तु यह कब तक चलेगा? कोन हमे सदा के लिए शांति व ख़ुशी प्रदान करेगा? इसीलिए यह आवश्यक हो जाता है कि जिस समय यह घोर अज्ञान की रात्रि जब इस धरा पर है तब स्वम् परमपिता शिव परमात्मा का इसी धरा पर आगमन हो और फिर से शांति और मूल्यों का संसार वो बनाएं।

आपको जानकर अत्यंत ख़ुशी होगी कि असल में वो तो पहले से ही इस धरा पर आया हुआ है एक साधारण सकरी माध्यम द्वारा फिरसे एक नए सुख, शांति व समृद्ध संसार को रचने। यह पवित्र महाशिवरात्रि का दिव्य सन्देश है। परमात्मा शिव को प्रेम से याद करके हम अपने सभी पापो से मुक्त हो सकते हैं। शिवरात्रि पर्व में साडी रात जागने का महत्व यही है की जो अभी का सारा संसार अज्ञान की घोर रात में है इसमे हमारा हमारे कर्मो पर पूर्ण ध्यान हो। आइये हम संकल्प करे कि हम पांच विकारो के प्रभाव से मुक्त रहेंगे और उनसे प्राप्त होने वाले कष्टों व भोगनाओं का हमारे अपने बुरे कर्मो द्वारा आहवाहन नहीं करेंगे। हमारे द्वारा अच्छी व पुण्य कर्म ही हों।

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